Tuesday, January 31, 2023
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Subhash Chandra Bose Jayanti: सुभाष चंद्र बोस की जीवनी। सुभाष चंद्र बोस जयंती | Subhash Chandra Bose Jayanti 2023

Subhash Chandra Bose Jayanti: भारत देश के एक महान क्रन्तिकारी नेता थे। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए आजाद हिन्द फौज का गठन किया था। और उन्होंने तुम मुझे खून दो में तुम्हे आजादी दूंगा का नारा दिया था। और भारत देश में लोग उन्हें प्यार से नेताजी के नाम से पुकारते है। अंग्रेजो से लोहा लेने के लिए वे पहले जापान गए और दूसरे विश्व युद्ध से पहले आजाद हिन्द फौज का गठन किया था।

Subhash Chandra Bose Jayanti
Subhash Chandra Bose Jayanti

नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नेता के रूप सेना को आगे बढ़ने के लिए प्रेरीत किया और दिल्ली चलो का नारा दिया। और नेताजी की सेना ने जापान की सेना के साथ मिलकर अंग्रेजो से बर्मा इम्फाल कोहिमा में जमकर मोर्चा संभाला था। इकीस अक्टूबर उन्नीस सौ तेतालीस को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सुप्रीम कमांडर होने के नाते सवतंत्र भारत की एक अस्थाई सरकार भी बनाई थी

जिसे ग्यारह देशो ने मान्यता दी। और जापान ने अंदमान निकोबार दिवपसमूह नेताजी को दिए थे जहा जाकर सुभाष चंद्र बोस ने उनका नया नाम दिया था। इसके बाद आजाद हिन्द फौज ने सुभाष चंद्र बोस के नेतर्त्व में एक बार फिर उन्नीस सौ चवालीस में बिर्टिश शासन पर हमला किया और भारत के कुछ प्रदेश को मुक्त भी करा लिया।

छह जुलाई को Subhash Chandra Bose ने रंगून से रेडियो के जरिये महात्मा गाँधी से बात की और युद्ध में विजय के लिए आशीर्वाद माँगा। नेताजी की मौत कैसे हुई इसका आज तक कुछ पता नहीं चल पाया है। तेहिस जनवरी को नेताजी की जयंती मनाई जाती है। इस पोस्ट में हम आपको नेताजी के बारे में पूरी जानकारी देंगे।

Subhash Chandra Bose का जीवन परिचय

Subhash Chandra Bose का जन्म तेहिस जनवरी अठारह सौ सत्तानवे को उड़ीसा के शहर कटक में हुआ था। उनका जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता जी का नाम जानकीनाथ बोस था और उनकी माताजी का नाम प्रभावती था। उनके पिताजी कटक के मशहूर वकीलों में से एक थे।

उनके पिताजी शुरुआत में सरकारी वकील थे लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरी को छोड़ कर अपनी खुद की प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। और वो बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रह चुके थे। ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चंद्र बोस के पिताजी को सम्मान में रायबहादुर की उपाधि भी दी थी। सुभाष चंद्र बोस कुल चौदह भाई बहन थे।

जिनमे सुभाष चंद्र बोस नोवी संतान और पांचवे नंबर के बेटे थे। सुभाष चंद्र बोस और उनके भाई शरद चंद्र में गहरा लगाव था जो की जानकीनाथ के दूसरे नंबर के बेटे थे। शरद चंद्र की शादी हो चुकी थी और उनकी पत्नी का नाम विभावती था।

Subhash Chandra Bose की शिक्षा और नौकरी

उनका जन्म कटक में हुआ था तो उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी कटक के प्राइमरी स्कूल में ही पूरी हुई थी इसके बाद इन्होने उन्नीस सौ उन्नीस में रेवेनसा कॉलेज में सनातक की पढाई के लिए दाखिला लिया था लेकिन तबियत ख़राब होने के बाद भी

उन्होंने सनातक की पढाई पूरी की और एक बार किसी बात को लेकर छात्रों और अध्यापको के बीच झगड़ा हो गया था तो सुभाष चंद्र बोस ने उनके लीडर के रूप में भूमिका निभाई थी। इसलिए उनको कॉलेज से एक साल के लिए निकल दिया गया । और किसी भी परीक्षा के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया और बंगाल रेजिमेंट में भर्ती देखने भी गए

लेकिन मेडिकल में अनफिट होने की वजह से उनको वहां भी सिलेक्शन नहीं मिला। इसके बाद कुछ जुगाड़ लगाकर उन्होंने स्कॉटिश कॉलेज में फिर से एडमिशन ले लिया। लेकिन उनकी इच्छा अब सेना में जाने की हो रही थी। और फिर से प्रयास करते रहे और फोर्ट विलियम सेना में रंगरूट के रूप में उनको प्रवेश मिल गया था।

लेकिन पिता जी की इच्छा के आगे उनको झुकना पड़ा और उनको इंग्लैंड जाना पड़ा और वहां उन्होंने आईसीएस की परीक्षा की तयारी की और चौथे रैंक के साथ पास भी हो गए। लेकिन अभी भी उनके दिमाग में सवामी विवेकानंद और अरविन्द घोष के विचार चक्कर लगा रहे थे। उनको कुछ भी समझ नहीं आ रहा था तो अपने भाई शरतचंद्र को पत्र लिखा और उनसे उनकी राय जाननी चाही। क्योकि वो आईसीएस की नौकरी करके अंग्रेजो की गुलामी नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आईसीएस की नौकरी छोड़ दी और वापस भारत लौट आये।

Subhash Chandra Bose की सवतंत्रता संग्राम में भूमिका

वापस भारत आने के बाद Subhash Chandra Bose ने देशबंधु चितरंजन दास से प्रभावित होकर उनके साथ काम करने की इच्छा जताई। जब वे भारत वापस आये तो वे सबसे पहले मुंबई गए और महात्मा गाँधी से मिले। उस समय महात्मा गाँधी मणिभवन में रहते थे। वहां पर बीस जुलाई उन्नीस सौ इकीस को उनकी मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई। और गाँधी जी ने उनको वापस कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी।

इसके बाद सुभाष चंद्र बोस कोलकाता वापस आ गए और चितरंजन दास बाबू से मिले। उस समय गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चला रखा था। और चितरंजन दास बंगाल में असहयोग आंदोलन की डोर संभाल रहे थे । और इसमें उनके साथ नेताजी भी शामिल हो गए।

इसके बाद उन्नीस सौ बाईस में चितरंजन दास ने कांग्रेस के अंतर्गत सवराज पार्टी की नीव रखी और कोलकाता महापालिका का चुनाव भी लड़ा। और जितने के बाद चितरंजन दास महापौर बन गए। और सुभाष चंद्र बोस को महापालिका का प्रमुख बनाया गया। सुभाष चंद्र बोस और चितरंजन दास ने महापालिका के काम करने के तरीको को बदल डाला और सभी ब्रिटिश नाम हटाकर भारतीय नाम रख दिए ।

इसी वजह से सुभाष चंद्र बोस एक युवा नेता के रूप में उभर कर सामने आये इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने जवाहर लाल नेहरू के साथ मिलकर नोजवानो के लिए इंडिपेंडेंट लीग की नीव रखी। साइमन कमिशन भारत आया तब उसका विरोध हुआ था और काले झंडे दिखाए गए थे । इसमें सुभाष चंद्र बोस आंदोलन के नेता थे।

Subhash Chandra Bose की गिरप्तारी

ब्रिटिश सरकार के आयोग साइमन कमिशन को जवाब देने के लिए कांग्रेस ने एक आठ सदस्य टीम को भावी सविधान बनाने का काम सौंपा। और मोतीलाल नेहरू को इस टीम का लीडर बनाया गया था और सुभाष चंद्र बोस इस टीम में एक सदस्य थे । कांग्रेस के बनाये इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की।

इसके बाद उन्नीस सौ अठाइस में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेसन हुआ जिसकी अधयक्षता मोती लाल नेहरू ने की थी। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेट्स लेने की पूरी तयारी कर दी थी। लेकिन नेताजी और जवाहर लाल नेहरू को पीछे हटना मजूर नहीं था वो नहीं चाहते थे की पूर्ण सवराजय की मांग को ख़ारिज किया जाये।

डोमिनियन स्टैट्स

इसलिए ये फाइनल किया गया की ब्रिटिश सरकार को एक साल का वक्त दिया जाता है। डोमिनियन स्टैट्स देने के लिए। और अगर एक साल के भीतर ब्रिटिश सरकार उनकी बात नहीं मानती है तो हम पूर्ण सवराजय की मांग करेंगे और अंग्रेज तो अपनी आदत से लाचार थे। उन्हें लगा की भारतीय कुछ नहीं करेंगे इसलिए उन्होंने वो मांग पूरी नहीं की।

इसके बाद कांग्रेस का लाहौर अधिवेसन हुआ और उसमे ये तय हुआ की छबीस जनवरी के दिन सवतंत्रता दिवस पुरे भारत में मनाया जायेगा। और छबीस जनवरी को जब सुभाष चंद्र बोस कोलकाता में राष्ट्र धवज फहराकर विशाल मोर्चे को संभाल रहे थे तब पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया और वो घायल हो गए और उनको जेल में भेज दिया गया।

जब सुभाष जी जेल में थे तब गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से समझौता किया की उनके राजनितिक बंदियों को रिहा किया जाये। उस समय भगत सिंह , राजगुरु , और सुखदेव भी उसी जेल में बंद थे और उनको फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। और गाँधी जी द्वारा भगत सिंह और उनके साथियो को नहीं बचा पाने पर सुभाष चंद्र बोस नाराज हो गए

कारावास

Subhash Chandra Bose को पुरे जीवन काल में कुल ग्यारह बार जेल भेजा गया था। सबसे पहले वो सोलह जुलाई उन्नीस सौ इकीस में छह महीने के लिए जेल गए थे। सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश सरकार ने शक की बिनाह पर जेल भेज दिया था। उन्नीस सौ पचीस में गोपीनाथ साहा ने कोलकाता पुलिस अफसर चाल्र्स टेगार्ट को मारने की प्लानिंग बनाई थी। लेकिन गलती से एक व्यापारी की मौत हो गई और गोपीनाथ साहा को गिरप्तार करके फांसी की सजा दे दी गई।

और इसकी खबर सुनकर सुभाष चंद्र बोस बहुत रोये और अंतिम संस्कार के लिए उनका शव माँगा था। और ब्रिटिश सरकार को संदेह हुआ की सुभाष चंद्र बोस भी उसके साथ मिला हुआ था और उसको पकड़ कर मांडले जेल में डाल दिया गया। और उन पर कोई मुकदमा नहीं चलाया गया था। इसके बाद पांच नवंबर उन्नीस सौ पचीस में चितरंजन दास की मौत हो गई थी।

मांडले जेल

वही दूसरी और मांडले जेल में रहने पर सुभाष चंद्र बोस को टीबी की बीमारी हो गई थी। फिर भी ब्रिटिश सरकार ने उनको छोड़ने से मना कर दिया। लेकिन ब्रिटिश सरकार एक शर्त पर उनको छोड़ने के लिए राजी हो गई की वो इलाज के लिए यूरोप चले जाये लेकिन बोस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और बात वही ख़त्म हो गई

लेकिन जेल में Subhash Chandra Bose की तबियत बहुत जयादा ख़राब हो गई। जिससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई थी और वो कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे इसलिए उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को छोड़ दिया इसके बाद वे डलहौजी चले गए और अपना इलाज करवाया। लेकिन उन्नीस सौ बतीश में उनको फिर पकड़ कर जेल में डाल दिया गया और उनकी तबियत फिर से बहुत ख़राब हो गई और डॉक्टर के कहने पर वो यूरोप चले गए

सुभाष चंद्र बोस का यूरोप निवास

अपनी बीमारी को लेकर परेशान Subhash Chandra Bose मज़बूरी में यूरोप चले गए। उन्नीस सौ तैतीस से लेकर उन्नीस सौ छतीस तक नेताजी यूरोप में रहे। और यहाँ पर भी उन्होंने अपने सवास्थय का ध्यान रखते हुए अपना कार्य जारी रखा। वहां पर नेताजी इटली के नेता मुसोलिनी से मिले और मुसोलिनी ने ब्रिटिश के खिलाफ भारत का साथ देने का वादा सुभाष चंद्र बोस को दिया।

वही पर आयरलैंड के नेता डी वालेरा भी सुभाष चंद्र बोस के करीबी मित्र बन गए थे। Subhash Chandra Bose के यूरोप प्रवास के दौरान जवाहर लाल नेहरू की पत्नी का निधन आस्ट्रिआ में हो गया था तो सुभाष चंद्र बोस आस्ट्रिआ गए और उनको सांत्वना दी। वहां पर Subhash Chandra Bose विठ्ठल भाई पटेल से मिले और उनके साथ काफी समय बिताया।

विठ्ठल भाई ने अपनी वसीयत में सारी धन दौलत सुभाष के नाम कर दी थी और उनकी मौत हो चुकी थी। लेकिन सरदार बलभ भाई पटेल को वो वसीयत मंजूर नहीं थी इसलिए उन्होंने मुकदमा चलकर सारी सम्पति वापस ले ली। जो बाद में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने हरिजन सेवा में दान कर दी।

इसी दौरान Subhash Chandra Bose को पता चला की उनके पिता की तबियत बहुत ख़राब है तो वो कोलकाता वापस आये लेकिन कोलकाता आते ही उन्हें फिर से ब्रिटिश सरकार ने पकड़ लिया और कई दिन जेल में रखने के बाद वापस यूरोप भेज दिया।

Subhash Chandra Bose का आस्ट्रिआ में प्रेम विवाह

नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने इलाज के लिए आस्ट्रिआ में रुके थे । तो वो अपनी पुस्तक भी लिख रहे थे तो उनको एक इंग्लिश जानने वाले टाइपिस्ट की जरुरत थी तो उनके एक मित्र ने एक महिला से मिलाया जिसका नाम एमिली था और वो महिला ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली थी। और उस महिला के पिता एक पशु डॉक्टर थे। और कुछ समय बाद सुभाष और एमिली के बीच प्यार की शुरुवात हो गई और उन्होंने शादी कर ली और एक बेटी को भी जन्म दिया। जिसका नाम अनीता था। जो आज भी जीवित है। और कभी कभी भारत आती रहती है।

हरीपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद

उन्नीस सौ अड़तीस में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेसन हरिपुरा में होने वाला था और इस अधिवेशन के लिए महात्मा गाँधी ने सुभाष चंद्र बोस को सेलेक्ट किया था। इस अधिवेसन में नेताजी ने बहुत ही प्रभावशाली स्पीच दी थी। और शायद ही कभी किसी नेता ने ऐसा भाषण दिया हो। अपने कार्यकाल के दौरान नेताजी ने योजना आयोग की नीव रखी थी। और पंडित जवाहर लाल नेहरू को इसका मुखिया बनाया गया था। और इसके आलावा एक विज्ञानं परिषद् की नीव भी रखी गई थी।

कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा

गाँधी जी ने ही Subhash Chandra Bose को अध्यक्ष बनाया था लेकिन वो उनकी कार्यशैली से खुश नहीं थे। और उसी समय दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चूका था। और नेताजी चाहते थे की इसी का फायदा उठाकर भारत में सवंत्रता के आंदोलन को तेज किया जाना चाहिए लेकिन गाँधी जी ऐसा नहीं चाहते थे।

लेकिन सुभाष चंद्र बोस को भी झुकना मंजूर नहीं था इसलिए गाँधी जी उनको पद से हटाना चाहते थे। इसके बाद चुनाव भी हुआ और इसमें भी सुभाष चंद्र बोस को ही जित मिली और गाँधी जी इससे बहुत नाराज हो गए और अधिवेशन भी नहीं आये

लेकिन कुछ समय बाद सुभाष चंद्र बोस की तबियत ख़राब होने की वजह से उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना

इसके बाद Subhash Chandra Bose ने कांग्रेस के अंदर ही एक नयी पार्टी की नीव रखी जिसका नाम था फॉरवर्ड ब्लॉक। इसके कुछ समय बाद कांग्रेस ने सुभाष चंद्र बोस को निकाल दिया और उनकी फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी एक सवतंत्र पार्टी बन चुकी थी।

नजरबन्दी से पलायन

Subhash Chandra Bose को ब्रिटिश सरकार ने नजरबन्द कर दिया था तो नेताजी ने निकलने के लिए एक प्लान त्यार किया और एक पठान की वेशभूषा में घर से निकल गए। कोलकाता से होते हुए गोमोह तक पहुंच गए। वहां से सीधे मेल पकड़कर पेशावर गए और पार्टी के लोगो से मिले। इसके बाद वे अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की और रवाना हो गए।

वहां से होते हुए वो रूस और इसके बाद जर्मनी पहुंचे। जर्मनी में सुभाष चंद्र बोस हिटलर से मिले लेकिन हिटलर से कोई सहायता नहीं मिली। वो जर्मनी से निकल कर पूर्व एशिया की और चले गए और वहां से इंडोनेशिया के पादांग बंदरगाह तक पहुँच गए थे। पूर्व ऐसा में Subhash Chandra Bose रास बिहारी बोस से मिले और रास बिहारी बोस ने सवेचा से सवतंत्र परिषद् का भार नेताजी को सौंप दिया।

जापान के प्रधानमंती ने नेताजी को सहायता का आश्वासन दिया। और यही पर Subhash Chandra Bose ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया। और आजाद हिन्द फौज में महिला बटालियन को रानी झांसी का नाम दिया गया। दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार से आजाद हिन्द फौज का मनोबल टूट गया और सेना हारने लगी थी। और सुभाष चंद्र बोस इसके बाद रूस से सहायता प्राप्त करने के लिए रूस रवाना हो चुके थे। रस्ते में विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई और इसके बाद उनको कभी नहीं देखा गया। आज तक ये सच्चाई सामने नहीं आ पाई है की उनकी मौत कैसे हुई।

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